Publications

Web Articles- Eng

Web Articles- Hindi

Biographies

Obituaries

SB Productions

Blogs

Book Reviews

Kamal La Storta pilgrimage

Posted on: 1 Dec, 2014

Modified on: 1 Dec, 2014

By

ला स्तोरता की मेरी वार्षिक तीर्थयात्रा
1 अगस्त 2011
31 जुलाई को संत इग्नासियुस लोयोला के पर्व दिवस के उपलक्ष्य में मैं ला स्तोरता प्रार्थनालय की भेंट कर अपने लिए और मेरे येसु धर्मसमाजी मित्रों के लिए प्रार्थना अर्पित करना चाहता था इसलिए मैंने पहली अगस्त 2011 को ला स्तोरता चैपल की भेंट कर अपनी वार्षिक तीर्थयात्रा सम्पन्न की।
मैं वाटिकन रेडियो में अपने दिन भर के काम समाप्त कर अपने सभी येसु धर्मसमाजी मित्रों को पर्व की बधाई और शुभकामनाओं वाली ई मेल भेजा। इसके बाद गहन उत्साह के साथ ला स्तोरता प्रार्थनालय की दर्शन करने के लिए चल पडा। मैं बस नम्बर 64 से संत पीटर्स रेल्वे स्टेशन आया और फिर संध्या 5.10 बजे वितेरबो जानेवाली ट्रेन लेकर ला स्तोरता के लिए चल पडा।
मैं रास्ते में सुंदर प्रकृति को निहारते हुए यह स्मरण करता रहा कि कैसे संत इग्नासियुस ने सब कुछ में ईश्वर की उपस्थिति और प्रेम को देखा, पाया और अनुभव किया तथा अपनी आध्यात्मिक साधना से दूसरों को भी सिखाया। रविवार 31 जुलाई को रोम परिसर में स्थित कास्तेल गोंदोल्फो प्रेरितिक प्रासाद के प्रांगण में देवदूत प्रार्थना के पाठ के समय विश्वासियों को सम्बोधित करते समय संत पापा बेनेडिक्ट 16 वें द्वारा कहे गये शब्दों का भी मैंने स्मरण किया जिसे मैंने रेडियो कार्यक्रम में हिन्दी श्रोताओं के लिए प्रस्तुत किया। संत पापा ने कहा था- प्रिय मित्रो, यूखरिस्त में येसु हमें हर भाई-बहन के लिए ईश्वर की सहानुभूति का साक्ष्य बनाते हैं। यूखरिस्तीय रहस्य इस प्रकार हमारे पड़ोसी के प्रति उदारता की सेवा को उत्पन्न करता है। इसका साक्ष्य येसु धर्मसमाज के संस्थापक संत इग्नासियुस लोयोला ने भी दिया जिसका आज कलीसिया पर्व मना रही है। वस्तुतः इग्नासियुस ने सब चीजों में ईश्वर को देखना तथा सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वर को प्रेम करना चुना। हमारी प्रार्थना को हम कुँवारी माता मरियम की मध्यस्थता के सिपुर्द करते हैं ताकि वे हमारे दिलों को भ्रातृत्वमय शेयरिंग और अन्यों के प्रति सहृदयता के लिए खोलें।
इन्हीं आध्यात्मिक विचारों पर गौर करते हुए मेरे मन में उमंग थी। मैं ला स्तोरता प्रार्थनालय की भेंट कर आंतरिक और आध्यात्मिक रूप से तरोताजा हो जाना तथा अपने प्रिय येसु धर्मसमाजी मित्रों के लिए प्रार्थना अर्पित करना चाहता था। इसलिए मैंने फादर जेवियर इरूदयाराज ये.स. द्वारा लिखित द लीडर मैगजीन के 16 से 31 जुलाई के अंक में छपे लेख " मार्कस ओफ इगनेशियन स्पिरिचुआलिटी " को पढ़ना शुरू किया और इसमें बताये गये 10 बिन्दुओं पर चिंतन करते हुए ठीक 5 बजकर 50 मिनट पर ला स्तोरता स्टेशन पहुँचा।
अ तीत की सुनहरी यादें ताजा हो उठीं। मैं तब इसोला फारनेसे में रहता था जो ला स्तोरता प्रार्थनालय से लगभग 3 किलोमीटर पर है। मैं सन 2002 से जून 2005 की अवधि में बस से उतरकर प्रतिदिन इसी प्रार्थनालय में प्रार्थना करने के बाद ला स्तोरता ट्रेन स्टेशन से ट्रेन लेकर लगभग 20 किलोमीटर की दूरी आधे घंटे में तय कर रोम स्थित अपने कार्यालय पहुँचता था। येसु समाजियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण इस लघु प्रार्थनालय में मैं सुबह और शाम प्रतिदिन 10 से 20 मिनट प्रार्थना में व्यतीत कर ईश्वरीय उपस्थिति का साक्षात्कार करता था। संत इग्नासियुस को कहे गये दिव्य शब्द " मैं रोम में तुम्हारे साथ होऊँगा " का न केवल मैं स्मरण करता था लेकिन अपने दैनिक जीवन और लोगों के साथ बातव्यवहार में भी अनुभव करता था। सन 2005 के अगस्त माह में मैंने निवास स्थान बदला और संत पीर्टस बासिलिका के निकट रहने लगा। मैं सन 2006 से साल में एक या दो बार ला स्तोरता प्रार्थनालय की भेंट कर अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझाता और अपनी धार्मिक आस्था का नवीनीकरण करता रहा हूँ।
मैं इन्हीं सुखद स्मृतियों और आंतरिक उमंग में ला स्तोरता स्टेशन से चलकर मात्र 5 मिनट की दूरी पर स्थित प्रार्थनालय पहुँचा और अंदर प्रवेश करना चाहा तो पाया कि दरवाजा बंद है और एक सूचना अंकित थी कि कुछ असामाजिक तत्वों के अपवित्र करनेवाले व्यवहारों के कारण प्रार्थनालय बंद है। यदि आप चर्च में प्रवेश करना चाहें तो पल्ली पुरोहित के पास जाकर चाभी ले लें। मन में निराशा हुई, कुछ गुस्सा आया और फिर शांत होकर मैंने विनम्रतापूर्वक शीशे के दरवाजे से झांकते हुए ही प्रार्थनालय के अंदर का नजारा देखा और सबके लिए दुआएँ कीं। संत इग्नासियुस की आध्यात्मिकता के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया तथा विश्व के सब येसु धर्मसमाजियों विशेष रूप से राँची प्रोविंश के पुरोहितों और फादर ओरेल ब्रिस का मैंने स्मरण किया जिन्होंने एल. एन. एन. में सात साल तक काम करते समय मुझे इस आध्यात्मिकता को दैनिक जीवन में जीने और ईश्वर की महत्तर महिमा के लिए फेथ शेयरिंग के माध्यम से अपने विश्वास को दूसरों को बांटना सिखाया। भूतपूर्व प्रोविंशियल फादर रंजीत पास्कल टोप्पो को धन्यवाद जो अपने प्रोविंशियल काल में निरंतर हिन्दी और अंग्रेजी में लेख लिख कर अपने दैनिक जीवन की घटनाओं और कार्यक्रमों की नियमित चर्चा कर संत इग्नासियुस की आध्यात्मिकता को प्रकट करते रहते थे।
जब मैं प्रार्थनालय की वीडियो ले रहा था तो चैपल के बगल ही बैठे कुछ गरीब ,अधेड़ व्यक्तियों में से एक व्यक्ति ने हाथ लहराकर मेरा ध्यान आकर्षित किया और पाँच यूरो देने की माँग की और फिर वह चला गया। प्रार्थनालय को बंद पाकर तथा इसके बगल में ऐसे गरीब अधेड़ उम्र के लगभग 10 लोगों के समूह को देखकर मुझे गहरा दुःख भी हुआ। मैं सन 2002 से 2005 की अवधि में कितने शांत मन से सुबह और शाम को बिना किसी बाधा के इस प्रार्थनालय में आता और सचमुच भगवान की निकटता का अनुभव पाता था। तमाम चुनौतियों, कठिनाईयों, दबाओं, जिम्मेदारियों के बावजूद इस छोटे से प्रार्थनालय में प्रवेश करते ही मुझे दिव्य साहचर्य का अहसास होता था।
मैंने प्रार्थनालय की तस्वीरें लेते समय ही देखा कि कुछ अन्य लोग भी आये और प्रार्थनालय में प्रवेश करना चाहे। मुझे उन्हें बताना पडा कि यह बंद है और इसकी चाभी पाने के लिए पल्ली पुरोहित के पास जाना पड़ेगा वो भी निर्धारित समय सीमा के अंदर। अतः लोग बाहर से ही शीशे से झाँककर अपनी आंतरिक प्यास को कुछ हद तक बुझाकर चल पड़े।
मैं ला स्तोरता दर्शन प्रार्थनालय परिसर में लगभग 15 मिनट बिताने के बाद लगभग दो सौ सीढियाँ चढ़कर निकट में ही कुछ ऊँचाई पर बने नये गिरजाघर की भेंट करने के लिए चल पड़। चर्च की बाहर दीवारों में मरम्मत काम चल रहा है। मैंने चर्च में प्रवेश कर देखा कि बायीं ओर दीवार में लकड़ी से बनी आकृति लगायी गयी है जो दर्शाती है कि क्रूस ढोये प्रभु येसु संत इग्नासियुस को दर्शन दे रहे हैं। मैं जानता हूँ कि यह दृश्य येसु धर्मसमाजियों के लिए अत्यंत महत्व का है।
चर्च में कुछ लोग उपस्थित थे ताकि संध्या मिस्सा पूजा में शामिल हो सकें। मुख्य वेदी की बगल में थोड़ी सजावट के साथ ही संत इग्नासियुस की मूर्ति रखी गयी थी। वहाँ मैंने कुछ समय प्रार्थना में व्यतीत किया। मैंने ईश्वर से मिले वरदानों का स्मरण कर संत इग्नासियुस की आध्यात्मिकता, येसुधर्मसमाजी मित्रों से निरंतर मिल रही सहायता, प्रेम और सहयोग के लिए प्रभु को धन्यवाद दिया।
मैंने चर्च के अंदर और बाह्य परिसर की कुछ तस्वीरें लीं और विडियो रिकार्ड किया। चर्च के बगल में ही पुरोहितों का निवास स्थान तथा एक विद्यालय है। प्राकृतिक छटा सुंदर है। मैं शांत और प्रफुल्लित मन से ला स्तोरता स्टेशन के लिए चल पडा। स्टेशन पर आने पर मालूम हुआ कि लगभग एक घंटा रूकना पड़ेगा इसलिए मैं पुनः ला स्तोरता प्रार्थनालय के पास आया और बस से रोम अपने निवास लौट आया।
मुझे खुशी है कि मेरी ला स्तोरता की वार्षिक तीर्थयात्रा सम्पन्न हुई। दूसरी ओर कुछ दुःख भी है कि चैपल के अंदर प्रार्थना नहीं कर सका। प्रार्थनालय परिसर के पास मैंने कुछ गरीब और अन्य तबके के लोगों को बैठे देखा। चार साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। जहाँ एक ओर इस वार्षिक तीर्थयात्रा से मेरी आस्था को बल मिला है दूसरी और मेरे मन में विचार आ रहा है - येसु धर्मसमाजी क्या कुछ उपाय कर सकते हैं ताकि इस लघु तीर्थस्थल की पवित्रता बनी रहे, निर्धनों के लिए कुछ प्रेरिताई काम हो तथा सुबह से शाम तक बिना किसी बाधा के यह पावन प्रार्थनालय विश्वासियों के लिए खुला रहे।
मेरी आशा है कि येसु धर्मसमाज के उच्चाधिकारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित होगा और वे अपने स्तर से कोई पहल या उपाय करेंगे ताकि संत इग्नासियुस के जीवन का एक महत्वपूर्ण स्थल, दिव्य सहायता का अनुभव देनेवाला प्रार्थना का पावन स्थल, विश्वासियों और तीर्थयात्रियों के लिए सुबह से शाम तक निर्बाध उपलब्ध रहेगा।
मेरी कामना है कि अधिक से अधिक लोग संत इग्नासियुस की आध्यात्मिकता से प्रेरणा पायें। वे येसुसमाजियों से सहयोग और मदद पायें ताकि उनके जीवन एवं काम से निरंतर ईश्वर की महत्तर महिमा होती रहे। वे सब चीजों में ईश्वर की उपस्थिति देख सकें और दिव्य प्रेम को अनुभव कर सकें।